
महाराष्ट्र में पेड न्यूज़ का सिलसिला कई साल से चल रहा है. अखबार जगत में टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह को इसका मसीहा कहा जा सकता है. इसकी कंपनी मीडिया नेट के जरिये मनोरंजन व व्यापार जगत की ख़बरें पैसे लेकर छापने का कारोबार शुरू किया गया. पर चुनाव के समय पेड न्यूज़ के मामले में लोकमत आगे रहा.
माना जाता है कि पिछले लोकसभा चुनाव में लोकमत और पुढारी अखबार समूह ने बड़े पैमाने पर इसकी शुरुआत की. लाखो रुपये लेकर चुनावी ख़बरें छपी गई. बड़े अखबार के कारण बाकी अख़बारों की हिम्मत भी बढ़ी. कांग्रेस के उम्मीदवारों की शिकायत थी कि हमारी पार्टी के नेता का पेपर है तो हमसे पैसा क्यों लिया जाता है? दरअसल लोकमत के मालिक कांग्रेसी नेता जवाहरलाल दर्डा थे और अब उनके बेटे विजय व राजेंद्र दर्डा इसे संभाल रहे हैं. मराठी का सबसे बड़ा अखबार भी यही है. पुढारी अखबार के बारे में शिकायत आई. राज्य में ज्यादातर अखबार बड़े नेताओं से जुड़े हैं. लोकमत के बाद सकाळ पेपर प्रभावी है जिसके मालिक केंद्रीय कृषिमंत्री के भाई प्रतापराव पवार हैं. एकमत पेपर केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख का है. मुंबई में राजस्व मंत्री नारायण राणे ने प्रहार के नाम से पेपर शुरू किया है. शिवसेना का मुखपत्र है सामना. संघ परिवार की ओर से तरुण भारत पेपर छापा जाता है. नागपुर में भाजपा नेता बनवारीलाल पुरोहित अंग्रेजी अखबार हितवाद के मालिक हैं. साफ़ है कि अपने राजनीतिक फायदे के लिये ही ये नेता अपने पेपरों का इस्तेमाल करते हैं. निष्पक्ष ख़बरों की उम्मीद उनसे करना बेकार है. पिछले चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ पैड न्यूज़ के रूप में कुछ ख़बरें लोकमत में छपी थी. तब दिल्ली तक शिकायत की गई थी और इसी वजह से राजेंद्र दर्डा को मंत्री नहीं बनाया गया था. इस बार लोकमत में पार्टी के प्रचार का खास ख्याल किया गया इसलिए राजेंद्र बाबू को कैबिनेट मंत्री बना दिया गया. धन्य है प्रेस और राजनीति का ये खेल. देश में महाराष्ट्र अकेला राज्य है जहाँ ये घालमेल इतने बड़े पैमाने पर चलता है.
वैसे एक दशक पहले भी कुछ पत्रकार चुनाव के मौके पर नेताओं से पैसे लेकर ख़बरें छापते थे. इनमे बड़े अखबार भी थे. लेकिन अब ये बीमारी व्यापक हो गई है. सीधे मालिक ही पेड न्यूज़ का सौदा करते हैं. इस बार के चुनाव में तो अखबारों के मालिक खुद ही लाखो की रकम लेने छोटे शहरों में घूम रहे थे. इसका कारण ये था कि कहीं बीच में पैसा कम न हो जाए. हाल में पत्रकारो के एक सम्मलेन में चिंता जाहिर की गई थी अब तो संपादक ब्रांड मेनेजर होंगे और पत्रकार बनेंगे सेल्समैन. दो महीने पहले के विधान सभा चुनाव में एक खबर छपी थी -बाला नांदगावकर की जीत पक्की. उसी के नीचे दूसरी न्यूज़ थी-दगडू सपकाल विजय की ओर. मजे की बात ये कि एक ही सीट के बारे में ये खबर थी. आखिर अखबारों की विश्वसनीयता का क्या होगा? क्या लोकतंत्र का ये स्तम्भ भी टूटने की कगार पर है? या अखबार मालिक और बाजार की ताकतें इस स्तम्भ को ख़त्म करने पर तुल गई हैं?
इंडियन एक्सप्रेस के रविवार ६ दिसंबर के अंक में पूरे पन्ने का लेख छपा है. इसमें पी साईनाथ के लेख से लेकर दिवंगत पत्रकार प्रभाष जोशी की और से उठाये गए मुद्दों तक पर चर्चा की गई है.
माना जाता है कि पिछले लोकसभा चुनाव में लोकमत और पुढारी अखबार समूह ने बड़े पैमाने पर इसकी शुरुआत की. लाखो रुपये लेकर चुनावी ख़बरें छपी गई. बड़े अखबार के कारण बाकी अख़बारों की हिम्मत भी बढ़ी. कांग्रेस के उम्मीदवारों की शिकायत थी कि हमारी पार्टी के नेता का पेपर है तो हमसे पैसा क्यों लिया जाता है? दरअसल लोकमत के मालिक कांग्रेसी नेता जवाहरलाल दर्डा थे और अब उनके बेटे विजय व राजेंद्र दर्डा इसे संभाल रहे हैं. मराठी का सबसे बड़ा अखबार भी यही है. पुढारी अखबार के बारे में शिकायत आई. राज्य में ज्यादातर अखबार बड़े नेताओं से जुड़े हैं. लोकमत के बाद सकाळ पेपर प्रभावी है जिसके मालिक केंद्रीय कृषिमंत्री के भाई प्रतापराव पवार हैं. एकमत पेपर केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख का है. मुंबई में राजस्व मंत्री नारायण राणे ने प्रहार के नाम से पेपर शुरू किया है. शिवसेना का मुखपत्र है सामना. संघ परिवार की ओर से तरुण भारत पेपर छापा जाता है. नागपुर में भाजपा नेता बनवारीलाल पुरोहित अंग्रेजी अखबार हितवाद के मालिक हैं. साफ़ है कि अपने राजनीतिक फायदे के लिये ही ये नेता अपने पेपरों का इस्तेमाल करते हैं. निष्पक्ष ख़बरों की उम्मीद उनसे करना बेकार है. पिछले चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ पैड न्यूज़ के रूप में कुछ ख़बरें लोकमत में छपी थी. तब दिल्ली तक शिकायत की गई थी और इसी वजह से राजेंद्र दर्डा को मंत्री नहीं बनाया गया था. इस बार लोकमत में पार्टी के प्रचार का खास ख्याल किया गया इसलिए राजेंद्र बाबू को कैबिनेट मंत्री बना दिया गया. धन्य है प्रेस और राजनीति का ये खेल. देश में महाराष्ट्र अकेला राज्य है जहाँ ये घालमेल इतने बड़े पैमाने पर चलता है.
वैसे एक दशक पहले भी कुछ पत्रकार चुनाव के मौके पर नेताओं से पैसे लेकर ख़बरें छापते थे. इनमे बड़े अखबार भी थे. लेकिन अब ये बीमारी व्यापक हो गई है. सीधे मालिक ही पेड न्यूज़ का सौदा करते हैं. इस बार के चुनाव में तो अखबारों के मालिक खुद ही लाखो की रकम लेने छोटे शहरों में घूम रहे थे. इसका कारण ये था कि कहीं बीच में पैसा कम न हो जाए. हाल में पत्रकारो के एक सम्मलेन में चिंता जाहिर की गई थी अब तो संपादक ब्रांड मेनेजर होंगे और पत्रकार बनेंगे सेल्समैन. दो महीने पहले के विधान सभा चुनाव में एक खबर छपी थी -बाला नांदगावकर की जीत पक्की. उसी के नीचे दूसरी न्यूज़ थी-दगडू सपकाल विजय की ओर. मजे की बात ये कि एक ही सीट के बारे में ये खबर थी. आखिर अखबारों की विश्वसनीयता का क्या होगा? क्या लोकतंत्र का ये स्तम्भ भी टूटने की कगार पर है? या अखबार मालिक और बाजार की ताकतें इस स्तम्भ को ख़त्म करने पर तुल गई हैं?
इंडियन एक्सप्रेस के रविवार ६ दिसंबर के अंक में पूरे पन्ने का लेख छपा है. इसमें पी साईनाथ के लेख से लेकर दिवंगत पत्रकार प्रभाष जोशी की और से उठाये गए मुद्दों तक पर चर्चा की गई है.
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